लालकृष्ण आडवाणी: बड़े पद को पाने का आखिरी मौक़ा भी हाथ से निकल गया.

इसके साथ ही लालकृष्ण आडवाणी के लिए कोई भी बड़े पद को पाने का आखिरी मौक़ा भी हाथ से निकल गया.

भारतीय जनता पार्टी ही नहीं, बल्कि जनसंघ और भाजपा के इतिहास में लालकृष्ण आडवाणी ‘लिविंग लीजेंड’ माने जाते हैं.

हैं- लाल कृष्ण आडवाणी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. दोनों हस्तियों ने पार्टी के विकास में सबसे अहम भूमिका निभाई है.

आज की पीढ़ी को शायद याद नहीं होगा कि किस तरह अडवाणी की एक ज़माने में तूती बोलती थी. उनकी लगभग पूजा होती थी और आरती उतारी जाती थी.

बाबरी मस्जिद अभी गिरी नहीं थी. आडवाणी ने जब

स्वतंत्र भारत में धर्म के नाम पर ऐसी सियासी रैलियां इस से पहले कभी नहीं निकाली गई थीं. नतीजा ये हुआ कि कुछ सालों में भाजपा की सीटें संसद में दो से 182 हो गईं. पार्टी अपने गढ़ उत्तर भारत से दूसरे प्रांतों में फैलने लगी.

बनियों की पार्टी कहलाने वाली भाजपा जाटों को भी स्वीकार्य होने लगी. पार्टी की लोकप्रियता बढ़ी. लेकिन जब पार्टी केंद्र में आई तो आडवाणी की जगह अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने.

आडवाणी उस समय विपक्ष और सहयोगी पार्टियों के बीच काफी विवादास्पद नेता माने जाते थे और गठबंधन सरकार की मजबूरियों के कारण वो प्रधानमंत्री बनने से वंचित रहे.

पिछले आम चुनाव से पहले जब पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार की बात आई तो उन्होंने मोदी का ज़बरदस्त विरोध किया.

एक बार फिर से उनकी हार हुई और मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने. इतिहास गवाह है कि इस फैसले ने पार्टी को एक नई जान दी, एक नया जोश दिया और एक नई सोच दी. आज पार्टी आडवाणी के ज़माने से कहीं आगे निकल चुकी है.

ज़ाहिर है नरेंद्र मोदी की कामयाबी ने आडवाणी को पार्टी में तन्हा कर दिया. आज भी वो तन्हा ही हैं. खुद आडवाणी ने न कभी अपनी पार्टी की तरफ़ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने की ख्वाहिश जताई और न ही कोई संकेत दिए. भले ही उनके समर्थक ऐसा कहते रहे हों.

खास तौर से कुछ महीने पहले जब बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के आरोपों की सुनवाई करते वक्त अदालत ने ये फैसला दिया कि उन्हें क्रिमिनल केस का सामना करना ही होगा, तो उनके ज्यादातर समर्थक समझ गए थे कि अब आडवाणी का राष्ट्रपति बनना असंभव है.

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