झारखंड: आदिवासी इलाक़ों में क़त्ल की बढ़ती घटनाओं से इस समुदाय को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता चिंता में हैं.

दरअसल इन घटनाओं की वजह से आदिवासी परिवार टूट-बिखर रहे हैं.

इससे सामाजिक तानाबाना बिगड़ने के ख़तरे भी बढ़े हैं. पिछले तीन महीने के दौरान पारिवारिक हत्या में कम से कम तीन दर्जन लोग मारे गए हैं.

पुलिस के मुताबिक अधिकतर घटनाओं में पत्नी, बच्चे, मां-बाप मारे जा रहे हैं. चाईबासा, खूंटी, रांची, दुमका, गुमला, पूर्वी सिंहभूम, सिमडेगा, पाकुड़ जैसे आदिवासी बहुल ज़िलों के गांवों में इन घटनाओं का सिलसिला जारी है.

चार जून को रांची में एक युवक ने सौतेले पिता की कथित तौर पर हत्या इसलिए कर दी कि उसे शराब पीने के लिए पैसे नहीं दिए.

‘डायन’ के शक में भी हत्याएं हो रही हैं. खूंटी के कनसीली गांव में डायन के शक में एक वृद्ध दंपती की हत्या के आरोप में पुलिस ने पिछले दिनों उनके दो भतीजों और बहू को गिरफ़्तार किया है.

डायन प्रथा के ख़िलाफ़ सालों से काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता पूनम टोप्पो बताती हैं कि शिक्षा और जन जागरूकता के अभाव में जोदू-टोना, ओझा-गुनी के चक्कर में आदिवासी परिवार बिखर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि इन मामलों में सरकारी स्तर पर जो प्रयास हो रहे हैं, वे नाकाफ़ी हैं. टोप्पो ने कहा कि पंचायतों और ग्रामसभा को भी ज़िम्मेवारी लेनी होगी, वरना इन घटनाओं पर रोक मुश्किल है.

हाल के दो ख़ौफ़नाक मामले सुर्खियों में हैं. बीस अप्रैल को झारखंड की राजधानी रांची के सुदूर गांव पुरनाटोली में एक आदिवासी ने कुल्हाड़ी से अपने तीन साल के मासूम बेटे के कथित तौर पर तीन टुकड़े कर दिए.

बुढ़मू पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर जेल भेजा है, जबकि एक मई को खूंटी में एक आदिवासी को सात साल के बेटे की कथित हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.

 

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