क़तर: तनाव की शुरुआत इस्लामी मुस्लिम ब्रदरहुड को क़तर की ओर से दिए जाने वाले समर्थन से हुई.

क़तर पर चरमपंथी संगठनों को फ़ंड मुहैया कराने के आरोप ने इतना तूल पकड़ लिया कि सऊदी अरब और खाड़ी के अन्य देशों ने अपने सारे संबंध तोड़ लिए.

ये पहली बार नहीं है कि क़तर के पड़ोसी देशों ने उसकी विदेश नीति को लेकर नाखुशी ज़ाहिर की है. 2014 में उसके साथ नौ महीने तक राजनीयिक संबंध टूटे रहे थे.

इसके अलावा तालिबान और अल क़ायदा से जुड़े हुए कुछ संगठनों से उसके क़रीबी रिश्ते और ईरान के साथ उसके संबंध भी इसका कारण रहे.

अभी हाल ही में सऊदी अरब ने ईरान पर आरोप लगाया था कि सरकारी धन से चलने वाला अल जज़ीरा यमन में हूती विद्रोहियों का समर्थन कर रहा है जो सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात समर्थित सरकारी फ़ौजों से लड़ रहे हैं.

हालांकि दोहा ने रियाद के इन आरोपों को पूरी तरह ख़ारिज किया है.

वैसे मौजूदा तनाव गैस प्रधान धनी देश क़तर की फ़ंडिंग पर रोशनी डालता है.

कथित तौर पर अप्रैल में क़तर ने सीरिया में अलक़ायदा के एक पूर्व सहयोगी और ईरानी सुरक्षा अधिकारियों को एक अरब डॉलर (लगभग 6400 करोड़ रुपये) की फ़िरौती दी थी.

इसके बदले शाही परिवार के 26 सदस्यों को छोड़ा गया था जिनका कथित तौर पर ईरान समर्थित इराक़ी शिया चरमपंथियों ने अपहरण कर लिया था.

इसके अलावा इस समझौते में उन दर्जनों शिया लड़ाकों को भी छोड़ा गया जिन्हें सीरिया में जिहादियों ने पकड़ लिया था.

इसलिए क़तर का कथित रूप से चरमपंथी विचारधारा को आर्थिक मदद देना जारी रखना, मौजूदा संकट की मूल वजह दिखता है.

9/11 हमले के बाद से अमरीकी नीत वैश्विक गठबंधन की ओर से चरमपंथियों की आर्थिक मदद को ख़त्म करने की लगातार कोशिश हो रही है.

कई नए क़ानून बनाकर चरमपंथियों की फ़ंडिंग को रोकने के लिए फ़र्जी कंपनियों, संस्थाओं की आर्थिक गतिविधियों पर पाबंदी लगाई गई, इससे जुड़ी संपत्तियों और व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाए गए.

लेकिन इसके बावजूद, क़तर जैसे कुछ मुख्य देशों की प्रतिबद्धता पर सवाल खड़ा किए जाते रहे हैं.

साल 2014 में तत्कालीन टेररिज़्म एंड फ़ाइनेंशियल इंटेलीजेंस के ट्रेज़री अंडर सेक्रेडरी डेविड कोहेन ने कहा था, “अमरीका के लंबे समय से सहयोगी रहे क़तर ने सालों तक खुले तौर पर हमास की मदद की. मीडिया में आई ख़बरों से संकेत मिलता है कि क़तर की सरकार सीरिया में चरमपंथी समूहों को भी मदद कर रही है.”

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